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कुशासन से किसके हिस्‍से में क्‍या आया



विधानसभा चुनावों में कुछ ही दिन शेष्‍ा बचे हैं। चुनाव का मतलब एक मतदाता के लिए आखिर क्‍या है। अपने बूथ पर जाकर बटन दबाना और पांच सालों के लिए अपनी जिम्‍मेदारी से निवृत हो जाना। नहीं, चुनाव का मतलब इतना ही नहीं है। 

एक जागरूक मतदाता के लिए चुनाव एक अहम निर्णय है, शायद उसकी नीजि जिंदगी के किसी फैसले से भी अधिक अहम। क्‍योंकि उसका नीजि फैसला उसके नी जि या उसके परिवार के जीवन को ही प्रभावित करता है, लेकिन मतदान का फैसला उसके व उसके परिवार के साथ-साथ, उसकी भावी पीढियों और प्रदेश के भविष्‍य को तय करता है। 

मतदान से पहले उसे देखना है कि बीते सालों में उसने जिन्‍हें अपना मत दिया, उन्‍होंने बदले में उसे क्‍या दिया। क्‍या वह उनके प्रतिनिधित्‍व से संतुष्‍ट है। अगर नहीं, तो क्‍यों। इन वजहों को टटोलना बेहद जरूरी है। 

बीते बरसों में प्रदेश में जो कुशासन रहा, उसकी बानगी देखिए। प्रदेश में सत्‍ता में काबिज रहे या उसका हिस्‍सा रहे प्रतिनिधियों के नीजि खजाने लगातार भरते गए। दस साल पहले विनोद शर्मा के पास 9 करोड की संपत्ति थी, लेकिन आज वह 157 करोड के मालिक हैं। सावित्री जिंदल पांच साल पहले 43 करोड और अब 113 करोड यानी दोगुने से भी ज्‍यादा, हरियाणा सरकार में मंत्री रही किरण चौधरी पांच साल पहले महज 10 करोड और अब 70 करोड से अधिक की स्‍वामी हैं। हजका सुप्रीमो कुलदीप बिश्‍नोई की भी तिजोरी की चमक ऐसे ही बढी है। 17 करोड से वह 79.95 करोड के मालिक बन गए हैं। मुख्‍यमंत्री भूपेन्‍द्र सिंह हुड्डा की तिजोरी की चमक भी बीते दस सालों में खूब बढी है। 

वहीं दूसरी ओर प्रदेश के वित्‍त मंत्री ने साल 2013-14 का जो बजट पेश किया था, वह बताता है कि प्रदेश सरकार पर लगभग 90 हजार करोड रूपए का घाटा है। लंबा-चौडा गणित नहीं, बहुत साधारण सी बात है प्रदेश यानी जनता लगातार कर्ज में डूबती जा रही है, लेकिन खुद को जनता का हितैषी बताने वाले इन नेताओं की तिजोरियां लगातार भरती जा रही हैं। जरा सोचिए कि जब ये लोग राजनीति में आए थे, तब इनके पास क्‍या था और आज इनके पास कितना है। आपको इस कुशासन से क्‍या मिला। कहावत है कि सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। वक्‍त रहते जाग जाएंगे तो बेहतर होगा। हमारा काम तो बस आपको जगाना है।

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