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महिला और राजनीति

08-03-2014

महिला और पुरूष दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। इसका वर्णन जॉन ग्रे ने भी अपनी किताब पुरूष मंगल ग्रह से और महिला शुक्र ग्रह से में किया है। वैसे भी भारतीय संस्‍कृति ग्रहों में विश्‍वास रखती है।

हमारा देश पुरूष प्रधान रहा है और आज भी है। महिला को देवी का रूप तो दिया लेकिन आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक मामलों में उसकी भूमिका सीमित रखी है। शारीरिक रूप से ताकतवर होने का लाभ भी पुरूष ने उठाया और संस्‍कृति व रीति-रिवाज की आड में महिला को दबाकर रखा।

लेकिन अब वह युग नहीं रहा है, जिसमें शारीरिक ताकत सबसे ज्‍यादा महत्‍व रखती थी। पुरूष की मानसिकता बदली और बेटी को बेटे के बराबर का दर्जा दिया जाने लगा। महिला को शिक्षा व आर्थिक विकास के अवसर मिलने लगे और उसने अपनी प्रतिभा को साबित कर दिखाया। महिला और पुरूष को बराबरी के दर्जे के कानून बनने लगे। शहरों में तो काफी कुछ बदल गया है, लेकिन गांव में रहने वालों की मानसिकता में बदलाव में शायद कुछ और समय लगेगा।

हर देश की तकरीबन 50 फीसदी आबादी महिलाओं की है। यह कहना गलत नहीं होगा कि राजनीति से देश चलता है, राजनीति से प्रदेश चलता है और राजनीतिक दिशा से ही सभी व्‍यवस्‍थाएं बनती व बिगडती हैं। ऐसे में एक इतने बडे वर्ग को राजनीति से दूर नहीं होना चाहिए। राजनति से कानून बनते हैं। कानून सही और बराबरी के बनें, इसके लिए महिलाओं को राजनीति में आकर सक्रिय भूमिका निभानी पडेगी। पुरूषों पर निर्भर रहना ठीक नहीं।

मैं आपसे अपनी बात करती हूं। मैं एक शिक्षित महिला हूं और ऐसे परिवार में पली-बडी, जहां बेटी को शिक्षा तो दी गयी लेकिन रक्षात्‍मक रूप से रखा गया। शादी हुई तो पति ने जीवन आत्‍मविश्‍वास से व अपने ढंग से जीना सिखाया। बराबरी का दर्जा दिया। और फिर मैं निकल पडी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर राजनीति में अपनी भूमिका निभाने के लिए।

महिलाओं का राजनीति में आना बेहद जरूरी है, क्‍योंकि महिला की पीडा एक महिला ही समझ सकती है। 50 फीसदी वर्ग को पुरूषों के रहम-ओ-कर्म पर नहीं छोडा जा सकता। यह भी सच है कि महिला ही महिला की दुश्‍मन रही है। लेकिन अगर बराबरी का स्‍थान चाहिए तो महिला को महिला का साथ देना होगा।

महिला का एक चरित्र है, आचरण है और उसकी मानसिकता भी पुरूषों से भिन्‍न है। महिला परिवार को चलाने के लिए कई भूमिकाओं का एकसाथ निर्वाह करती है। कभी परिवार की मुखिया होने का तो कभी घर चलाने में मदद करके वित्‍त मंत्री होने का और कभी अपनी सूझ-बूझ भरी सलाह से गृहमंत्री होने का दायित्‍व निभाती है। यही नहीं, कठिन समय में वह अपना सर्वस्‍व परिवार के लिए बलिदान करने से भी नहीं चूकती। मेरा मानना है कि अगर महिला कोशिश करे तो वह ज्ञान व अनुभव अर्जित करके एक अच्‍छी शासक बन सकती है। बडा दु:ख होता है जब मैं देखती हूं कि कैसे महिलाएं सरपंच, पार्षद या किसी और राजनीतिक पद पर पहुंच तो जाती हैं, लेकिन उनके पति, बेटे, भाई या ससुर ही उनके काम को करते हैं। शायद यह महिलाओं की कमजोरी है, क्‍योंकि वह उस पद पर अपने दम से नहीं पहुंची होती। महिलाओं को अपनी काबिलियत को बढाना होगा।

महिलाओं को राजनीति में आना चाहिए, ऐसा कहना आसान है लेकिन होना मुश्किल क्‍योंकि महिलाओं के लिए राजनीति में आने का माहौल इतना अनुकूल नहीं है। सामाजिक और आर्थिक बंधनों में बंधी है महिला लेकिन इसका हल भी तो महिला को ही निकालना होगा। यह जरूरी नहीं कि हर महिला सक्रिय रूप से राजनीति में कूद पडे, लेकिन वह लोकतंत्र में एक अहम् भूमिका निभा सकती है। अपना वोट सोच-समझ कर डाल सकती है, अच्‍छे नेता चुनने में अपना योगदान दे सकती है।

महिला दिवस पर मैं यही कहना चाहूंगी कि जिन महिलाओं की परिस्थितयां ऐसी हैं कि वे सक्रिय रूप से राजनीति में आ सकती हैं तो जरूर आएं। अन्‍य महिलाओं को चाहिए कि वे राजनीति को सही करने में अपना योगदान दें। यह भी ध्‍यान रखें कि राजनीति एक संघर्ष है और इसको झेलने की मानसिकता का होना भी जरूरी है। जो महिलाएं मेरे साथ‍ मिलकर काम करना चाहती हों, मैं उनका स्‍वागत करती हूं।

लेखिका
नीलम अग्रवाल
प्रदेश अध्‍यक्ष, समस्‍त भारतीय पार्टी

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