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आखिर ठुक गयी ताबूत में आखिरी कील



दस साल के कुशासन ने प्रदेश में कांग्रेस के राज को अंत की ओर पहले ही धकेल दिया था। अब टिकटों के बंटवारें के बाद कांग्रेस की करारी हार के ताबूत में आखिरी कील भी ठाेक दी गयी। कांग्रेस आला कमान ने सारे दागियों और दूसरें दलों से टूटकर आए बागियों को टिकट बांटकर तुश्टिकरण की राजनीति की है। 

खबर है कि टिकट बंटवारे में हुड्डा की पसंद-नापसंद का खयाल रखा गया है  और इसकी वजह है कि पार्टी प्रदेश के बहुसंख्‍यक जाति विशेष मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहती थी। यह दर्शाता है कि कांग्रेस हो या भाजपा ये भले ही खुद को सेक्‍युलर बताते हों, लेकिन असल में ये जात-पात और साम्‍प्रदायिक राजनीति करने में ही विश्‍वास रखते हैं। येन केन प्रकारेण इनकी नजर सत्‍ता हथियाने में रहती है।

बहरहाल, भले ही कांग्रेस ने हुड्डा समर्थकों को वोट बांटकर जातिगत राजनीति का दांव खेला हो, लेकिन इस बार उसका यह दांव खाली जाने वाला है, क्‍योंकि सभापा के 'नया चुने सही चुनें' अभियान से प्रदेश के मतदाताओं में जागरूकता का संचार हुआ है। वे उम्‍मीदवार की जाति नहीं, बल्कि उसका चरित्र, उसकी छवि और जनसेवा की इच्‍छाशक्ति देखकर ही मतदान करेंगे। 

सभापा के इस प्रचार अभियान से युवा मतदाता भारी संख्‍या में जुड रहे हैं। विरोधी दलों को यह बात रास नहीं आ रही है, इसीलिए विरोधियों ने सभापा के कई कार्यकर्ताओं को लालच देकर, बहलाकर तोडने का प्रयास भी किया। उन्‍हें डर है कि समस्‍त भारतीय पार्टी प्रदेश में सच्‍चाई और ईमानदारी की जिस नयी राजनीति की शुरूआत कर चुकी है, वह कहीं उनके भ्रष्‍टाचारी अस्तित्‍व को प्रदेश से विलुप्‍त न कर दे।

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