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लोकसभा चुनाव 2014- क्‍या खोया क्‍या पाया

17 मई, 2014 ।

भारतीय परंपरा रही है कि जब परिवार में कोई बडा आयोजन होता है तो उसके बाद परिवार के सदस्‍य एक आकलन अवश्‍य करते हैं। आकलन इस बात का कि आयोजन में कहीं कोई कमी तो नहीं रह गयी, कौन खुश हुआ और कौन नाराज। लोकसभा चुनाव 2014 भी एक वृह्द आयोजन था और भारतीय परिवार का एक जिम्‍मेदार नागरिक होने के नाते हमें भी आकलन कर लेना चाहिए कि इस आयोजन से आखिर हमने क्‍या खोया और क्‍या पाया। किसे खुश होना चाहिए और किसे नाराज।

लोकसभा चुनाव 2014 के परिणाम मेरे लिए आश्‍चर्यजनक नहीं है। ज्‍यादातर खबरिया चैनल भी इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपा रहे हैं कि उन्‍होंने जो एक्जिट पोल दिखाए थे, वे काफी हद तक सही साबित हो गए हैं। लिहाजा इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जिसका विश्‍लेषण या आकलन किया जाए।

सवाल यह है कि भाजपा को एतिहासिक विजय दिलाने वाले इन परिणामों के गर्भ में आखिर कौन सा कारण विद्यमान है। आप कहेंगे कि यह भी भला कोई पूछने की बात है। सारा देश ‘मोदी लहर’ का राग आलाप रहा है। अब तो मोदी प्रधानमंत्री बनने वाले हैं, फिर भला क्‍या पूछना बाकी रह जाता है।

हमारा मंथन मोदी को लेकर नहीं, बल्कि मोदी नाम की इस लहर को लेकर है। क्‍या लोकतंत्र में किसी एक व्‍यक्ति विशेष का कद देखते-देखते इतना ऊंचा हो जाता है कि बाकी तमाम चीजें उसके सामने बोनी हो जाती हैं, यहां तक खुद भाजपा के कई दिग्‍गज और वरिष्‍ठ नेता भी। नरेंद्र मोदी नाम की इस लहर में आखिर खास बात क्‍या है। क्‍या जनता ने महज इस नाम से या मोदी के भाषणों और रैलियों से प्रभावित होकर उन्‍हें वोट दे दिया।

अगर ऐसा ही है तो रैलियां करने और प्रचार में कांग्रेस भी पीछे नहीं रही। मगर दोनों पार्टियों के चुनाव परिणामों में बेहद अंतर है। अगर देश में सत्‍ता परिवर्तन की इस नब्‍ज को टटोला जाए तो मालूम होगा कि मोदी लहर के पीछे मोदी का निजी व्‍यक्त्वि नहीं, न उनके भाषण और न रैलियां बल्कि एक राज्‍य के रूप में गुजरात का विकास अहम है। देश के वे तमाम मतदाता, खासकर युवा मतदाता, जिन्‍होंने कभी भूले से भी गुजरात भ्रमण नहीं किया है या गुजरात के बारे में कोई खास जानकारी नहीं हैं, वे भी ऐसा कहते देखे जाते हैं कि विकास हो तो गुजरात जैसा। चूंकि गुजरात के मुख्‍य मंत्री नरेंद्र मोदी रहे हैं, तो इस विकास के साथ उनका नाम जुडना स्‍वाभाविक भी है। असल में मतदाताओं ने मोदी को नहीं, बल्कि इस उम्‍मीद को मतदान किया है कि इस सत्‍ता परिवर्तन से उनके राज्‍यों और समूचे देश में विकास की लहर आएगी।

 

यह बात भी गौर तलब है कि इस परिवर्तन में युवा मतदाताओं की भूमिका सबसे अहम रही है। लोकसभा 2014 चुनावों में 2.3 करोड यानी कुल मतदाताओं के 10 फीसदी नए मतदाता रहे। मतदान के बढे हुए प्रतिशत में इन युवा मतदाताओं की संख्‍या खासी रही है। इस सत्‍य को नकारना भूल होगी कि युवा मतदाता जात-पात, धर्म और क्षेत्रवाद जैसी बातों से आकर्शित नहीं होता। उसे तो सिर्फ अपना सुखद भविष्‍य चाहिए। ऐसी सरकार चाहिए जो देश को बेहतर शिक्षा, नए रोजगार और तरक्‍की की राह पर अग्रसर करे।

अगर हम हरियाणा की बात करें तो भाजपा को आश्‍चर्यजनक परिणाम मिले हैं। हरियाणा में अब तक जाट और गैरजाट की राजनीति होती रही है और शायद इसी तथ्‍य को समझकर भाजपा हमेशा यहां किसी न किसी क्षेत्रिय पार्टी का दामन थामकर चुनाव मैदान में उतरी है। इस बार भी उसने क्षेत्रिय पार्टी के साथ गठबंधन तो किया, लेकिन जिसके साथ गठबंधन किया उसे स्‍थानीय मतदाताओं ने सिरे से नकार दिया। विजयश्री का ताज यहां भी भाजपा के सिर बंधा। यह भी साफ-साफ एक ही बात की ओर इशारा करता है और वह है मतदाताओं में जातिवादी संकीर्णता से ऊपर उठकर विकास की ललक का पैदा होना।

रूझान बताते हैं कि हरियाणा में भी युवा मतदाताओं ने अहम भूमिका अदा की है। यहां नए यानी पहली दफा मतदान करने वाले मतदाताओं की संख्‍या 3 लाख, 49 हजार, 239 है। कुल युवा मतदाताओं की संख्‍या देखें तो वह काफी अधिक है। हरियाणा ही नहीं, बल्कि उत्‍तर प्रदेश, झारखंड, राज्‍स्‍थान, मध्‍य प्रदेश और छत्‍तीसगढ राज्‍यों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है।

इससे यह समझ लेना चाहिए कि आने वाले समय में केवल वही पार्टी सत्‍तसीन होगी या मतदाता जीत का ताज केवल उसी पार्टी या नेता को पहनाएंगे जो जातिवाद, धर्म, क्षेत्रवाद जैसी संकीर्ण बातों को छोडकर देश के विकास की बात करेंगे। इस बार की यह जीत वास्‍तव में किसी व्‍यक्ति विशेष की जीत नहीं बल्कि मतदाताओं में अपने अधिकार और अपनी उन्‍नति के लिए उत्‍पन्‍न हुई सजगता की जीत है। उन्‍होंने अपने तेवर साफ कर दिए हैं कि हम केवल उसी के साथ हैं, जो विकास की बात नहीं, बल्कि विकास करके दिखाएगा। अगर वह ऐसा नहीं करता है तो हम उसे सत्‍ता से उतारने में देर नहीं करेंगे फिर चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा या कोई और।

 

समस्‍त भारतीय पार्टी

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