join party
Donate
supporter
volunteer
share
क्या अच्छा आंदोलनकारी अच्छा शासक हो सकता है ?

22-03-2014
आज देश बहुत ही गहन राजनितिक परिस्थितियों से गुजर रहा है। पि छले दस वर्ष के कांग्रेस शासन ने ऐसे हालात पैदा कर दिए कि देश बदलाव चाहता है। महंगाई, भ्रष्टाचार, घोटाले, कुप्रबंधन, बेरोजगारी जैसी समस्याओं ने इस युवा देश को हिला कर रख दिया। ऐसे में किसी न किसी आंदोलन का व्यापक रूप से खड़ा होना स्वाभाविक है और वैसे भी भारत आंदोलनों का गढ़ रहा है। व्यवस्था परिवर्तन के लिए लोगों ने बार बार आंदोलन किये, सरकारें भी बदली लेकिन व्यवस्था नहीं बदली। क्यों ?

क्योंकि आंदोलनकारी ही सत्ता पर काबिज हो गए और वह कभी भी अच्छे शासक नहीं बन पाये। एक आंदोलनकारी और अच्छा शासन देने वाले लीडर कि विशेषताओं और मानसिकता में बहुत फर्क होता है। जैसे कि;

आंदोलनकारी एक विषय पर ही केंद्रित होता है और उसी का समाधान चाहता है और कभी भी प्रबंधन के दूसरे विषयों को ध्यान में नहीं रखता। जबकि शासनकर्ता को सभी विषयों का ध्यान रखना होता है।

आंदोलनकारी संघर्ष और त्याग कि मानसिकता रखता है और दूसरों को भी इसी के लिए तैयार करता है। जबकि अच्छा शासनकर्ता लोगों के जीवन को कैसे आरामदेह व खुशहाल बना सकता है इसके बारे में सोचता है।

आंदोलनकारी ऐसे विषयों को छेड़ता है जिससे लोगों के सपने और भावनाएं जुडी होती हैं और वह उम्मीदें वास्तविक रूप में पूरी हो सकती हैं या नहीं उस पर ज्यादा सोच विचार नहीं करता। जबकि शासनकर्ता वास्तविकता को मद्देनजर रख कर काम करता है।

आंदोलनकारी के ऊपर कोई प्रतिबंध नहीं होता और न ही वह किन्ही सीमाओं में बंध कर काम करता है। जबकि शासनकर्ता को सीमाओं में बंधकर काम करना होता है।

आंदोलनकारी किसी नियम, तंत्र या सिद्धांत से बंधा नहीं होता। जबकि शासनकर्ता को इनका पालन करना होता है।

आंदोलनकारी अराजकता फ़ैलाने में विश्‍वास रखता है। जबकि शासनकर्ता समस्या का समाधान करने में विश्‍वास रखता है।

आंदोलनकारी कोई जिम्मेदारी लेने या जवाबदेही के लिए तैयार नहीं होता। जबकि शासनकर्ता के ऊपर जिम्मेदारी व जवाबदेही होती है।

आंदोलनकारी का न तो शासन चलाने का दृष्टिकोण साफ़ होता है और न ही प्रबंधन क्षमताएं होती हैं। जबकि शासनकर्ता के अंदर इन दोनों का होना बहुत जरूरी है।

आंदोलनकारी लोकलुभावनी बातें या विषयों को ही उठाता है। जबकि शासनकर्ता को सभी विषयों पर काम करना होता है चाहे लोकप्रिय हों या नहीं।

आंदोलनकारी कम से कम समय में अपनी बातें शासन से मनवाना चाहता है और विषय का समाधान होते ही आंदोलन खत्म हो जाता है। जबकि शासन एक निरंतर प्रक्रिया है।

ऊपर दिए गए दस बिंदुओं से आप नतीजा निकाल सकते हैं की आंदोलनकारी अच्छा शासन देने वाला नहीं हो सकता और भारत में इसके कई उदाहरण भी हैं। महात्मा गांधी इस देश के सबसे बड़े आंदोलनकारी हुए। आजादी आंदोलन कि सफलता के बाद उन्होने कहा कि अब हमें कांग्रेस को खत्म करके शासन उन लोगों के हाथ में सौंप देना चाहिए जो शासन चलाने की क्षमताएं रखते हों। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उसका नतीजा आज देश भुगत रहा है।

उसके बाद 1977 में भ्रष्टाचार मिटाने और समाजवाद के लिए जे पी आंदोलन हुआ। केंद्र में सरकार बदली गई और आंदोलनकारी शासक बन गए लेकिन उपरलिखित कारणों कि वजह से शासन नहीं चला पाये और 2 वर्ष में ही सब कुच्छ खत्म हो गया।

1985 में असाम आंदोलन के बाद आंदोलनकारी सत्ता में आये। वह भी ज्यादा देर नहीं चल पाये।

फिर बोफोरज काण्ड को लेकर आंदोलन हुआ। सरकार बदली गई। वी पी सिंह की सरकार बनी और उसने देश का क्या हाल किया उसका नुकसान अभी तक सहना पड़ रहा है।

इसके बाद और भी कई आंदोलन हुए, और जो सत्ता में बैठे उनका हश्र ऐसा ही हुआ।

2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल को लेकर अन्ना आंदोलन हुआ। जिस विषय को लेकर आंदोलन हुआ उसमें सफलता मिली और लोकपाल बिल संसद में पास हुआ। लेकिन इस आंदोलन से जुड़े अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों का सत्ता में बैठने का मोह पैदा हो गया और आम आदमी पार्टी के नाम से राजनितिक दल बना लिया। भ्रष्टाचार के विरूद्ध जन लोकपाल को फिर से मुद्दा बनाया और दिल्ली कि जनता से अनाप-शनाप वायदे किये, सपने दिखाए और भावनाओं से खेला। नतीजा चुनाव जीत गए और कस्मों और वायदों को तोड़ कर दिल्ली में सरकार बनाई। ऊपरलिखित दस कारणों कि वजह से दिल्ली सरकार 48 दिन ही चल पाई और आंदोलनकारियों ने सत्ता छोड़ दी। सत्ता चलाना और आंदोलन करना, दोनों में बड़ा फर्क है।

दिल्ली सरकार तो चला नहीं पाये लेकिन आंदोलनकारियों दवारा बनाई गयी आम आदमी पार्टी जनता को फिर से सपने दिखाने में लगी है। फैसला जनता को करना करना होगा कि वह क्या चाहती है।

आंदोलनकारी कभी भी सत्ता में बैठकर व्यवस्था परिवर्तन करने में सफल नहीं हुए, हाँ अपनी बातों को सरकार से मनवाने में कई बार सफल जरूर हुए हैं।

मेरा यह मानना है कि इस देश को ना तो अब राजनितिक क्रांति कि जरूरत है और ना ही सत्ता के लिए आंदोलनों की। जरूरत है तो ऐसे लोगों कि जो देश को स्वच्छ राजनीति और बढ़िया शासन दे सकें। स्वच्छ, भ्रष्टाचारमुक्त, कुशल, सिद्धांतवादी व दूरदृष्टी रखने वाले लोग राजनीती में आयें और जनता को ना गुमराह करके, ना बहकाकर और ना सपने दिखा कर बल्कि जनता को सही बात बता कर चुनाव जीतें। देश के और तंत्र में रह कर, अफसरशाही (ब्यूरोक्रेसी) को साथ लेकर देश और प्रदेशों की व्यवस्था बदलने के लिए कार्य करें। जरूरत अनुसार सविंधान, तंत्र व कानूनों को बदलें। इसी से देश में स्थाई बदलाव आयेगा, देश उन्नति कि तरफ बढ़ेगा और लोगों कि उम्मीदें पूरी होंगी।

सुदेश अग्रवाल
(राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष, सभापा)

Back