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क्या भाजपा - कांग्रेस से भिन्न है ?

16-03-2014
I wish all the readers a Happy Holi.

आजकल नरेन्द्र मोदी का ज्यादा और भाजपा का कम आलाप होता है। कहा जाता है कि भाजपा तो कैडर आधारित पार्टी है तो ये फिर व्यक्तिविशेष क्यों बन गई।

मैं हरियाणा की राजनीति से वाकिफ हूँ। भाजपा ने हरियाणा में लोक सभा की टिकटों के वितरण में जो किया उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये दूसरे राज्यों में भी यही कर रहे होंगे। इससे मेरी रा य और भी पक्की हो गई कि भाजपा और कांग्रेस में कोई अंतर नहीं है और नमो / भाजपा का मकसद किसी भी तरह से सत्ता में आना है। मेरा ये मानना रहा है की गलत नीवं पर सही ईमारत नहीं बनाई जा सकती।

समस्त भारतीय पार्टी का गठन करने से पहले मैंने सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रिय पार्टियों का विश्लेषण किया था। भाजपा को मैंने अन्य पार्टियों से बेहतर पाया लेकिन जब इन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए अपने तीन मुद्दों को ही छोड़ दिया जिन को लेकर पार्टी चली हुई थी तो भाजपा और कांग्रेस में फर्क बचा ही नहीं। भाजपा ने भी वही सब कुछ किया जो कांग्रेस करती रही। भाजपा के तीन मुद्दे जिनको उन्होंने छोड़ा ;

1. Uniform Civil Code एकसमान नागरिक नियमावली
2. Article 370 सविंधान की धारा 370
3. Lord Rama Temple राम मंदिर

वाजपायी सरकार कांग्रेस सरकार की तरह कई कड़े फैसले लेने में भी नाकाम रही। नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में भी सिद्धांतों को ताक पर रखा जा रहा है। आज तो इनका सिर्फ एक ही उद्देश्य है की किसी भी कीमत पर सत्ता पर काबिज होना। इसका उधारण है हरियाणा में लोक सभा की टिकटों का वितरण।

• धर्मबीर सिंह - जिन्हे भिवानी महेन्द्रगढ़ लोक सभा सीट की टिकट दी गई। ये टिकट मिलने से 2 दिन पहले कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए।

• राव इंद्रजीत सिंह - जिन्हे गुड़गाव लोक सभा सीट की टिकट दी गई। ये फरवरी 2014 में कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए।

• रमेश कौशिक - जिन्हे सोनीपत लोक सभा सीट की टिकट दी गई। ये कुछ ही महीने पहले कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए।

• राज कुमार सैनी - जिन्हे कुरुक्षेत्र लोक सभा सीट की टिकट दी गई। ये भी कुछ ही महीने पहले कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए।

• सरिता दुग्गल - जिन्हे सिरसा लोक सभा सीट की टिकट दी गई। ये तो शायद अभी भाजपा में शामिल होंगी।

10 में से 5 सीटें तो अवसरवादी कांग्रेसियों को दे दी, 2 सीटें हजका को चली गई जो पुराने कांग्रेसी हैं। सिर्फ 3 सीटें भाजपा के कैडर के लोगों को मिली हैं।

ऐसे में भाजपा कांग्रेस से अलग नीतियां कैसे बना पायेगी।

भाजपा ने अपने कैडर में विश्वास न जताकर कांग्रेस के बागी नेताओं पर विश्वास जताया है। इससे पार्टी को लोक सभा चुनाव में और आने वाले विधान सभा चुनाव में बहुत बड़ा नुक्सान हो सकता है।

राजनीतिक संस्कृति का स्तर इतना गिर चुका है कि सिद्धांतों और नैतिकता का तो कुछ बचा ही नहीं। एक नयी आशा आम आदमी पार्टी के रूप में उभरी लेकिन उसका भी स्वरूप ठीक नहीं निकला। देश को ऐसे राजनीतिक दल या दलों की जरूरत है जो हर हाल में स्वार्थ से ऊपर उठकर सिद्धांतों और नैतिकता की राजनीती करें। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक जनता को इन्ही पार्टियों में से किसी को चुनना पड़ता है और जो कम बुरी लगती है उसे लोग सत्ता में बैठा देते हैं इस उमीद के साथ कि शायद ये अच्छा करेंगे।

समस्त भारतीय पार्टी सिद्धांतों पर चलकर और नैतिकता से इस राजनीतिक व्यवस्था को बदलना चाहती है। स भा पा मानती है कि उसे यह कम से कम एक राज्य में करके दिखाना होगा कि कैसे नैतिकता और सिद्धांतों से स्वच्छ राजनीति और बढ़िया शासन दिया जा सकता है तभी जनता विश्वास करेगी। इसिलिए स भा पा सिर्फ हरियाणा में सक्रियता से काम कर रही है। स भा पा यह तभी करके दिखा सकती है जब जनता इसे मौका देगी।

अंत में इतना ही कहना चाहूंगा की भाजपा के दावे भी अन्य पार्टियों कि तरह खोखले हैं लेकिन लोक सभा चुनाव में इससे बेहतर विकल्प भी नजर नहीं आता।

लेखक
सुदेश अग्रवाल
राष्ट्रीय अध्यक्ष, समस्त भारतीय पार्टी

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